रामेश्वरम के काले श्रीराम - FULLSKY NEWS

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Monday, September 7, 2020

रामेश्वरम के काले श्रीराम

सितम्बर २०१९ की बात है, मैंने अपने परिवार के साथ रामेश्वरम जाने की योजना बनाई। उस समय मैं बैंगलोर में नौकरी कर रहा था और रामेश्वरम जाने के लिए पहले मदुरै जाना पड़ता था। ये मेरे लिए और भी सुखद था क्यूंकि मैं माता मीनाक्षी के भी दर्शन करना चाहता था। तो पहले हम मदुरै पहुंचे और उसी शाम हमारी रामेश्वरम के लिए ट्रेन थी। तो सुबह करीब ५ बजे हम मीनाक्षी मंदिर पहुंचे। ऐसा भव्य मंदिर मैंने आज तक नहीं देखा था। काफी देर तक हम वहाँ रहे और फिर शाम को रामेश्वरम के लिए निकल पड़े।

रामेश्वरम पहुँच कर सबसे पहले हम मंदिर गए और सौभाग्य से हमें ज्योतिर्लिंग के दर्शन भी हो गए। अगले दिन रामेश्वरम भ्रमण की योजना बनी जिसमें सबसे पहले धनुषकोडि जाने का विचार किया। धनुषकोड़ि भारत की अंतिम सीमा है और यही वो स्थान है जहाँ से श्रीराम ने लंका तक रामसेतु का निर्माण किया था। आश्चर्यजनक रूप से ये स्थान वैज्ञानिक रूप से भी वो स्थान है जहाँ से श्रीलंका की सीमा सबसे निकट है। धनुषकोडि के समुद्र तट पर मेरी पत्नी ने भी एक शिवलिंग की स्थापना की।

वहाँ से हम वापस शहर में आये तो बीच में एक श्रीराम का मंदिर आया। तो उसके दर्शनों के लिए हम वहाँ रुक गए। वहाँ सबसे पहले हमारी नजर पड़ी एक नाग मंदिर पर जहाँ बहुत सारी नाग मूर्तियां रखी थी। इतनी सारी नाग मूर्तियां मैंने एक साथ कभी नहीं देखी थी। जब मैं मदुरै में था, जब रामेश्वरम आया तो दोनों मंदिरों में एक बात आम थी कि वहां कैमरा/मोबाइल ले जाना मना था। यही कारण था कि मैं मंदिर के अंदर की तस्वीरें नहीं ले सका। किन्तु यहाँ नाग मंदिर में फोटो खींचने की मनाही नहीं थी इसी कारण मैंने कुछ अच्छी तस्वीरें ली।

उस नाग मंदिर के बिलकुल विपरीत श्रीराम का मंदिर था। जब हम वहाँ पहुँचे तो सामने नजर पड़ते ही मैं हैरान रह गया। वहाँ श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण की काली प्रतिमा रखी थी। मैंने अपने जीवन में कृष्ण वर्ण के श्रीराम को कभी नहीं देखा था। मैंने पहले आस पास देखा कि कही इस मंदिर में भी तो तस्वीर लेने की मनाही नहीं है। मैंने वहाँ उपस्थित एक स्थानीय व्यक्ति से भी इस बारे में पूछा, उन्होंने कहा कि तस्वीर ली जा सकती है। तो मैंने अपने मोबाइल से उस अद्भुत प्रतिमा की एक तस्वीर ली।

तभी वो हुआ जो मेरे जीवन का एक अविस्मरणीय अनुभव बन गया। जैसे ही मैंने वो तस्वीर ली, एक ब्राह्मण, जो कदाचित उस मंदिर के प्रधान पुजारी थे, वे अत्यधिक क्रोध में वहाँ आये और बहुत जोर-जोर से तमिल में कुछ बोलने लगे। ये बिलकुल अप्रत्याशित था। कुछ समय तक तो मुझे समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या है। इतना तो मुझे समझ आ गया था कि वो मेरे तस्वीर खींचने पर क्रोधित हैं किन्तु वो कह क्या रहे थे वो मुझे समझ नहीं आया। वो लगातार तमिल कुछ बोल रहे थे और वो भाषा मुझे नहीं आती थी। वहाँ खडी कुछ स्थानीय महिलाओं ने भी उन्हें समझने का प्रयास किया किन्तु वे लगातार बोले ही जा रहे थे।

मैंने उनसे कहा कि मुझे तमिल समझ में नहीं आती। तब उन्होंने हिंदी में कहा कि मैंने तस्वीर क्यों खींची? उसी समय कई और भी पुजारी उस मंदिर को घेर कर खड़े हो गए। मुझे समझ में आ गया कि मुझसे गलती हो गयी है। मैंने उनसे तत्काल कहा कि मुझसे गलती हो गयी, मुझे पता नहीं था कि इस मंदिर में तस्वीर लेना मना है। मैं अभी इस तस्वीर को डिलीट कर देता हूँ। किन्तु इतना कहने पर भी उनका क्रोध शांत नहीं हुआ, उलटे उनका गुस्सा और बढ़ गया। माहौल बहुत अजीब सा हो गया था और मेरी पत्नी भी बहुत घबरा गयी।

मुझे लगा कि अब वहाँ और रुकना ठीक नहीं है इसी कारण मैं वापस जाने लगा। तभी उस पुजारी ने कहा कि जिस फ़ोन से मैंने वो तस्वीर ली है उसे तोड़ दो। ये बहुत अजीब था, उसपर से वो मोबाइल मेरी कंपनी का था, इसीलिए मैंने मना कर दिया और फिर से कहा कि अगर आप चाहें तो मैं तस्वीर डिलीट कर देता हूँ। पर वे मोबाइल तोड़ने पर अड़े रहे। मैं ऐसा नहीं कर सकता था इसीलिए मना कर दिया।

तब उन्होंने वो कहा जिसे सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। उन्होंने कहा कि मैं वो मोबाइल तोड़ दूँ अन्यथा एक महीने के भीतर मेरी मृत्यु हो जाएगी। अब ये अति थी। मैं चुप-चाप उनकी बात सुनता रहा। वो एक के बाद एक ऐसे कई उदाहरण बताते रहे जिसमें लोगों ने उनकी बात नहीं मानी और उनका अनिष्ट हो गया। मैं तब तक सुनता रहा जब तक बोलते रहे। अंत में वे स्वयं चुप हुए। मैंने श्रीराम को नमन किया और वहाँ रखे दान पेटी में कुछ पैसे डालने लगा। उन्होंने तत्काल मुझे ऐसा करने से रोक दिया। मैंने भी जिद नहीं की और हम उस मंदिर से बाहर आ गए।

बाहर आ कर कुछ देर तो मैं सोचता रहा कि आखिर ये हुआ क्या? अगले दिन हमें वापस जाना था इसीलिए हम और कहीं घूमने नहीं गए और वापस होटल आ गए। शाम को हमने एक बार फिर श्री रामेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन किये और अगले दिन हम वापस बैंगलोर के लिए निकल गए। वापसी में भी मैं लगातार उसी घटना के विषय में ही सोच रहा था।

मैंने ये निश्चय किया कि अब तो मैं कुछ करूँ या ना करूं लेकिन इन श्रीराम के दर्शन सबको करवाऊंगा। मेरी पत्नी बिलकुल ऐसा नहीं चाहती थी और वो काफी समय मुझे कहती रही की मैं उस तस्वीर को डिलीट कर दूँ। किन्तु मैंने उसकी बात नहीं मानी। उसके अगले दिन मैंने वो तस्वीर धर्मसंसार के फेसबुक पेज पर डाली। बहुत दिनों से इस अनुभव को साझा करना चाह रहा था किन्तु आज जाकर मौका मिला है। जाते-जाते आप सब को भी श्रीराम की उस अद्भुत प्रतिमा के दर्शन करवा देता हूँ। 


जय श्रीराम।


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