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Saturday, October 24, 2020

नवदुर्गा


आप सभी को नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें। वैसे तो धर्म संसार पर माता दुर्गा, अष्टमातृका एवं दश महाविद्या पर लेख पहले से लिखा जा चुका है किन्तु इस नवरात्रि सोचा कि एक लेख माता के उन ९ रूपों पर भी लिखा जाये जिस कारण नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। इस लेख में सभी ९ देवियों का संक्षिप्त विवरण विवरण दिया जायेगा। उन सभी पर विस्तृत लेख बाद में प्रकाशित किया जाएगा।

वैसे तो नवरात्रि वर्ष में ४ बार मनाई जाती है - पौष, चैत्र,आषाढ़ और अश्विन, किन्तु दो नवरात्रियों - चैत्र एवं अश्विन के नवरात्र अधिक प्रसिद्ध हैं। इन दोनों में भी अश्विन नवरात्र अधिक धूम-धाम से मनाया जाता है, जो अभी चल रहा है। इसी प्रकार पौष और आषाढ़ मास में पड़ने वाले नवरात्र को गुप्त नवरात्र के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रि में माता अम्बा के नौ रूपों की पूजा की जाती है जिन्हे "नवदुर्गा" कहा जाता है। नवदुर्गा का नाम दुर्गा सप्तशती के एक श्लोक में दिया गया है:

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना
  1. शैलपुत्री: नवदुर्गा में प्रथम शैलपुत्री हैं जिनका सम्बन्ध दक्ष पुत्री और महादेव की प्रथम भार्या माता सती से है। जब देवी सती ने अपने पिता के यज्ञ में आत्मदाह कर लिया, तब महादेव को पुनः प्राप्त करने हेतु वे अगले जन्म में हिमालय राज की पुत्री पार्वती के रूप में जन्मी। शैलराज हिमालय की पुत्री होने के कारण ये शैलपुत्री कहलाई। इनका मन्त्र है - वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्‌। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌॥
  2. ब्रह्मचारिणी: ये सदैव तप का आचरण करने वाली हैं इसी कारण इनका नाम ब्रह्मचारिणी हुआ। जब माता पार्वती ने महादेव को वर के रूप में प्राप्त करने का निश्चय किया तब उन्होंने तप आरम्भ किया। उन्होंने लम्बे समय तक केवल महादेव को ध्यान में रख कर ऐसा घोर तप किया जैसा ना किसी ने अब तक किया था और ना ही फिर किसी ने किया। उसी रूप में वे ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध हुई। इनका मन्त्र है - दधाना करपद्माभ्यामक्षमाला-कमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
  3. चंद्रघंटा: ये नवदुर्गा का तीसरा रूप है और इनके मस्तक पर अर्ध चंद्र विद्यमान है इसी कारण इन्हे चंद्रघंटा के नाम से जाना जाता है। दस भुजाओं वाली इन देवी का रंग स्वर्ण की भांति है और वैसा ही तेज इनसे निरंतर निकलता रहता है। ये सिंह पर सवार होती हैं और अपने सभी भुजाओं में विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को धारण करती है। इनका मन्त्र है - पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकेर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥
  4. कुष्मांडा: ऐसी मान्यता है कि माता के इस चौथे रूप की हंसी से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई है इसीलिए इनका नाम कुष्मांडा पड़ा। इन्हे आदिरूपा अथवा आदिशक्ति भी कहा गया है। इनका लोक सूर्यमण्डल के अंदर बताया गया है क्यूंकि सूर्य के तेज को सहने की शक्ति केवल इन्ही में है। इनकी ८ भुजाएं हैं इसी कारण ये अष्टभुजा के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। इन्हे कद्दू की बलि अत्यंत प्रिय है। संस्कृत में कद्दू को कुष्मांड कहा जाता है और ये भी इनके नाम का एक कारण है। इनका मन्त्र है - सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदाऽस्तु मे॥
  5. स्कंदमाता: भगवान कार्तिकेय महादेव के ज्येष्ठ पुत्र हैं जिनका एक नाम स्कन्द भी है। इन्ही की माता के रूप में देवी का पांचवा रूप स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। इनकी चार भुजाएं हैं और उनमें ये कार्तिकेय को गोद में उठाये है। इनका रूप शुभ्र (श्वेत) है और वे कमल के आसन पर विद्यमान रहती हैं। इसी कारण इनका एक नाम पद्मासना भी है। इनका मन्त्र है - सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदाऽस्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
  6. कात्यायनी: कात्य गोत्र में एक प्रसिद्ध ऋषि हुए महर्षि कात्यायन। उन्होंने माँ भवानी की घोर तपस्या की और उनसे वर माँगा कि वे उन्हें पुत्री के रूप में प्राप्त हों। उनकी प्रार्थना को स्वीकार कर माता ने उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया और कात्यायनी कहलाई। इनकी उपासना से मनुष्य को अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष इन चारों की प्राप्ति होती है। इनका मन्त्र है - चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानव-घातिनी॥
  7. कालरात्रि: माता के इस रूप के उच्चारण मात्र से आसुरी शक्तियाँ दूर भागने लगती हैं। तीन नेत्रों वाली इन माता का रूप बहुत भयानक है किन्तु सज्जनों को ये सदैव शुभ देने वाली हैं इसी कारण से इनका एक नाम शुभंकरी भी है। इनकी सिद्धि से समस्त ब्रह्माण्ड के द्वार साधक के लिए खुल जाते हैं एवं वो समस्त दुःख और भय से मुक्त हो जाता है। इनका मन्त्र है - एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥ वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥
  8. महागौरी: पूर्ण गौर वर्णीय ये देवी "अष्टवर्षा", अर्थात आठ वर्ष की मानी गयी है। इनके सभी वस्त्र एवं आभूषण स्वेतवर्णीय हैं इसी कारण इन्हे "श्वेताम्बरधरा" भी कहा गया है। ऐसी मान्यता है कि महादेव को वर के रूप में प्राप्त करने के लिए माता पार्वती ने इतना कठोर तप किया कि उसके ताप से उनका शरीर काला पड़ गया। बाद में भोलेनाथ ने उन्हें पहले की भांति गौरवर्णा बना दिया। इनका मन्त्र है - श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेव-प्रमोद-दा॥
  9. सिद्धिदात्री: जैसा कि नाम से प्रतीत होता है, माता का ये ९वां रूप सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाला है, जिन्हे "अष्टसिद्धि" कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि इन माता की पूजा करने से बांकी देवियों की पूजा स्वतः ही हो जाती है। एक कथा के अनुसार जब भगवान शंकर सिद्धियों को प्राप्त करने हेतु तपस्या कर रहे थे तो इन्ही देवी ने उन्हें सिद्धि प्रदान की थी। इन्होने ही भगवान शंकर के साथ एकाकीकार होकर अर्धनारीश्वर रूप धरा था। इनका मन्त्र है - सिद्धगन्धर्व-यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥


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