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Friday, November 13, 2020

धन्वन्तरि


आप सभी को धनतेरस की हार्दिक शुभकामनायें। धनतेरस पर एक लेख पहले ही धर्मसंसार पर प्रकाशित हो चुका है जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। ये पर्व देव धन्वन्तरि के सम्मान में मनाया जाता है। इस दिन स्वर्ण खरीदने की प्रथा है और ऐसी मान्यता है कि आज के दिन खरीदे गए स्वर्ण में १३ गुणी वृद्धि हो जाती है। ऐसी मान्यता है कि धनतेरस के दिन ही धन्वन्तरि की उत्पत्ति हुई थी। विष्णु पुराण एवं आयुर्वेद में इनका बड़ा महत्त्व बताया गया है। आइये हम धन्वन्तरि देव के विषय में कुछ जानें:
  • धन्वन्तरि को देवताओं का वैद्य एवं आयुर्वेद का जनक माना गया है। आयुर्वेद के तीन सबसे बड़े ग्रंथों - चरक संहिता, सुश्रत संहिता और अष्टांग संग्रह के अतिरिक्त सभी अन्य ग्रंथों में वे आयुर्वेद के प्रणेता माने गए हैं।
  • आयुर्वेद के विषय में कहा गया है कि सर्वप्रथम भगवान ब्रह्मा ने इसकी उत्पत्ति की जिसमें १००००० श्लोक और १००० अध्याय थे। ब्रह्मा से ये विद्या प्रजापति को प्राप्त हुई। प्रजापति से इसे अश्विनीकुमारों ने प्राप्त किया। अश्विनीकुमारों ने विद्या देवराज इंद्र को दी और फिर इंद्र से इसे धन्वन्तरि ने प्राप्त किया। बाद में धन्वन्तरि ने सम्पूर्ण आयुर्वेद को ८ भागों में बाँट कर लिखित रूप दिया।
  • धन्वन्तरि ने १०० प्रकार की मृत्यु बताई है जिनमें से केवल १ ही काल मृत्यु है। शेष ९९ अकाल मृत्यु से बचने का मार्ग ही धन्वन्तरि ने आयुर्वेद में बताया है। 
  • हमारे धार्मिक ग्रंथों में तीन धन्वन्तरि का वर्णन मिलता है:
    • समुद्र मंथन से उत्पन्न धन्वन्तरि: ऐसा वर्णन है कि जब देवों और दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किया तो उससे १४ मुख्य रत्न निकले। उन्ही में से अंतिम रत्न अमृत लेकर स्वयं धन्वंतरि प्रकट हुए।
    • राजा धन्व के पुत्र धन्वन्तरि: दूसरी कथा के अनुसार राजा धन्व ने अज्ज नामक देवता की आराधना की और उनसे वरदान माँगा कि वे उन्हें पुत्र के रूप में प्राप्त हों। तब धन्व को एक पुत्र की प्राप्ति हुई जिनका नाम धन्वंतरि पड़ा।
    • काशिराज दिवोदास धन्वन्तरि: धन्वन्तरि के ही वंश में काशीनरेश दिवोदास जन्में जिन्होंने अपने महान पूर्वज का नाम अपनाया और स्वयं धन्वंतरि कहलाये। इन्होने काशी में प्रथम आयुर्वेद का विश्वविद्यालय बनवाया और सुश्रत, जो महर्षि विश्वामित्र के पुत्र थे और दिवोदास के सबसे प्रिय शिष्य थे, उन्हें यहाँ का प्रथम प्राचार्य बनाया। इनका जन्म ईसा से ११००० वर्ष पूर्व माना गया है। 
  • भागवत पुराण के अनुसार धन्वन्तरि को भगवान विष्णु के २४ अवतारों में से एक माना गया है।
  • कहते हैं कि धन्वन्तरि की चिकित्सा शक्ति इतनी प्रबल थी कि वे मृत व्यक्ति को भी जीवित कर देते थे। यही देख कर देवताओं ने छल कर इन्हे समुद्र में छिपा दिया। जब समुद्र मंथन हुआ तो ये पुनः समुद्र से अमृत के साथ बाहर आ गए।
  • समुद्र से बाहर आने पर धन्वंतरि ने भगवान विष्णु से अपना पद माँगा तो उन्होंने कहा कि सभी पद देवताओं को दिया जा चुका है। किन्तु उन्होंने धन्वन्तरि को आशीर्वाद दिया कि वे द्वितीय द्वापर में महाकाल की नगरी में पुनः जन्म लेंगे। उन्ही के वरदान स्वरुप वे काशी नरेश धन्व के पुत्र के रूप में जन्में। 
  • ऐसी मान्यता है कि जब धन्वन्तरि समुद्र से अमृत लेकर निकले और दैत्यों से उसे बचाने को भागे तो उसी प्रयास में अमृत की कुछ बूंदें काशी में गिर गयी। तब से काशी कालजयी नगरी बन गयी। 
  • महाभारत में तक्षक एवं महर्षि कश्यप के बीच "विषविद्या" को लेकर एक संवाद है जिसमे धन्वन्तरि का जिक्र है और इसमें उन्हें कश्यप पुत्र गरुड़ का शिष्य बताया गया है।
  • एक कथा के अनुसार धनतेरस के दिन प्रादुर्भाव होने के बाद धन्वंतरि यमराज के पास गए और उनसे पूछा कि क्या प्राणियों के प्राण लेते समय आपको दया नहीं आती? तब प्राणिमात्र के लिए इतनी वेदना देख कर यमराज ने उन्हें वरदान दिया कि आज आपके प्रादुर्भाव के दिन जो भी आपकी पूजा करेगा उसकी कभी भी अकाल मृत्यु नहीं होगी।
  • गरुड़ एवं मार्कण्डेय पुराण में ऐसा वर्णन है कि जब महर्षि गालव अपने गुरु विश्वामित्र के लिए ८०० श्यामकर्ण अश्व ढूंढने निकले तो उन्हें प्यास लगी। तब एक स्त्री ने उन्हें पानी पिलाया जिससे तृप्त होकर उन्होंने उसे पुत्रवती होने का वरदान दिया। तब उस स्त्री ने कहा कि वो वीरभद्रा नामक एक वेश्या है। ये सुन्दर ऋषि उसे एक आश्रम ले गए और उसके गोद में पुष्प से एक बालक की आकृति बना कर उसे जीवित कर दिया। वही धन्वन्तरि कहलाये। महर्षि गालव और माधवी की कथा यहाँ पढ़ें। 
  • देश भर में, विशेषकर दक्षिण भारत में इनके कई मंदिर हैं। इनका सबसे बड़ा मंदिर केरल के नेल्लुवाई नामक स्थान पर है। इसके अतिरिक्त त्रिशूर, रामनाथपुरम, उडुपी, जामनगर, वालाजपत, मंदसौर आदि स्थानों पर धन्वंतरि देव के मंदिर हैं। 
  • एक अन्य प्रसंग के अनुसार आयु के पुत्र धन्वन्तरि गंगा के तट पर तपस्या कर रहा था। तब श्रीहरि ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे इंद्र पद प्रदान किया। किन्तु पूर्वजन्म के पाप के कारण वो तीन बार इन्द्रपद से च्युत हुआ।
    • वृत्रहत्या के फलस्वरूप नहुष द्वारा। 
    • सिंधुसेन वध के कारण। 
    • अहिल्या से अनुचित व्यवहार के कारण। 
ॐ धन्वंतरये नमः॥



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